Thursday, August 29, 2019

बताते हैं, "एलयूटीएफ़ 2002 में बनी मुफ़्ती

इसके अलावा उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि संसद के पास ब्रेग्ज़िट मुद्दे पर बहस करने के लिए 'पर्याप्त समय' है.
बोरिस जॉनसन के कहा, "हमें नए क़ानून की ज़रूरत है. हम नए और महत्वपूर्ण बिल आगे लेकर आ रहे हैं इसीलिए हम महारानी का भाषण रखने जा रहे हैं"
संसद को निलंबित करने के विचार ने विवाद पैदा कर दिया है. आलोचकों का कहना है कि ये ब्रेग्ज़िट मामले में सांसदों को उनकी लोकतांत्रिक भागदारी निभाने से रोक देगा.
पूर्व प्रधानमंत्री जॉन मेजर समेत कई बड़े चेहरों ने इसके ख़िलाफ़ अदालत में जाने की धमकी दी है. एसएनपी पार्टी की प्रवक्ता जोआना चेरी पहले ही इस मामले को चुनौती देने के लिए स्कॉटिश अदालतों में अपना काम शुरू कर चुकी हैं.
बीबीसी के शाही संवाददाता जॉनी डायमंड का कहना है कि ये उदाहरण महारानी के भाषण से पहले संसद को निलंबित करने के लिए था और अब रानी के लिए सरकार के अनुरोध को ठुकराना असंभव होगा.
वो कहते हैं कि ये सभा महारानी के ऊपर से काफ़ी बोझ कम कर देगी और कुछ लोगों के अनुसार इसे ग़ैर-राजनीतिक रूप से चित्रित किया गया है.
प्रधानमंत्री ने कहा है कि वो एक डील के साथ 31 अक्तूबर को यूरोप संघ छोड़ना चाहते हैं लेकिन ये 'करो या मरो' की स्थिति होगी.
स्कॉटलैंड की मंत्री निकोला स्टर्जन ने कहा कि सांसदों को अगले सप्ताह इस योजना को रोकने के लिए एक साथ आना होगा या "आज का दिन ब्रिटेन के लो
बहुत पीछे नहीं लेकिन 1989 तक तो जाना ही होगा. इसी साल लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) घोषित किए जाने की मांग को लेकर यहां बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.
बौद्धों का ताक़तवर धार्मिक संगठन 'लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन' (एलबीए) इन प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहा था.
एलबीए की ताक़त की मिसाल देते हुए लेह के मुख्य बाज़ार में एक दुकानदार ने कहा कि आज अगर किसी वजह से एलबीए दुकानें बंद करने को कहे और भाजपा खोले रखने का आग्रह करे तो यहां एलबीए की चलेगी, भाजपा की नहीं. एलबीए लद्दाख के नेताओं के लिए एक ‘पॉलिटिकल लॉन्चपैड’ भी रहा है और यहां के कई बड़े नेता एलबीए से ही निकले हैं.
तो साल 1989 के प्रदर्शनों की अगुवाई एलबीए कर रहा था और इसकी कमान 42 साल के थुप्सतान छेवांग के हाथों में थी. इन प्रदर्शनों में तीन नौजवानों की जान चली गई थी. उन्हें आज भी एलबीए ‘शहीद’ मानता है.
ये प्रदर्शन 'यूटी आंदोलन' में मील का पत्थर साबित हुए क्योंकि राजीव गांधी सरकार इस पर बात करने को तैयार हुई. यूटी का दर्जा तो नहीं मिला लेकिन कुछ साल बाद ‘स्वायत्त हिल डेवलपमेंट काउंसिल’ के रूप में जम्मू-कश्मीर सरकार से अलग कुछ फ़ैसले करने का अधिकार मिल गया.
स्थानीय अख़बार 'रीच लद्दाख' की संपादक रिंचेन आंगमो के मुताबिक, इस आंशिक सफलता ने थुप्सतान छेवांग को एक सम्मानित और जनप्रिय नेता के तौर पर स्थापित किया.
जब हिल काउंसिल बनी तो छेवांग ही उसके पहले चीफ़ एग्ज़ीक्यूटिव काउंसलर हुए और इस तरह वह सक्रिय प्रशासनिक-राजनीति में आए. राजनीतिक करियर के शुरुआती चार-पांच साल उन्होंने कांग्रेस में गुज़ारे.
लेकिन यूटी की मांग अब भी अधूरी थी. लिहाज़ा साल 2002 में उन्होंने कांग्रेस, एनसी, पीडीपी और दूसरी पार्टियों में सक्रिय सभी अहम क्षेत्रीय नेताओं को साथ लेकर एक नया संगठन बनाया- 'लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट' यानी एलयूटीएफ. इसमें तमाम विचारों के नेता थे लेकिन सबका मक़सद एक था- लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्ज़ा दिलवाना.
एलयूटीएफ़ को ज़बरदस्त शुरुआती सफलता मिली. दो विधायक निर्विरोध चुन लिए गए. 2004 में पहली बार थुप्सतान छेवांग एलयूटीएफ़ के बैनर तले निर्दलीय लोकसभा चुनाव जीत गए.
अतीत में कांग्रेस में रहे और अब पूर्णकालिक पत्रकारिता कर रहे सेवांग रिगज़िन बताते हैं कि एलयूटीएफ़ लद्दाख वालों के लिए एक भावनात्मक मुहिम बन गया था और तमाम आम लोगों के साथ वो ख़ुद इससे जुड़ गए
पहली इमारत है लेह में भाजपा का पुराना दफ़्तर, जहां बीस कार्यकर्ताओं के ठीक से बैठने की व्यवस्था भी नहीं है.
टूटी हुई दो-तीन कुर्सियां, एक पुरातन सोफ़ा और भीतर एक प्लाज़्मा टीवी है जिसकी मरम्मत से भी अब कारीगर कतराएंगे.लेकिन यहां से नौ मिनट दूर मनाली हाइवे पर भाजपा के नए निर्माणाधीन दफ़्तर की भव्य इमारत पूरी ठसक के साथ खड़ी हुई है.
इसे एक बड़े पहाड़ के ऐसे हिस्से पर बनाया गया है, जहां इससे पहले कुछ नहीं था. भाजपा दफ्तरों की नई-पुरानी इमारतों के बीच नौ मिनट का फ़र्क़ है और यहां इस राष्ट्रीय दल के उभार की कहानी भी अधिकतम नौ साल पुरानी ही है.
2010 में पहली बार उसे काउंसलर चुनावों में चार सीटों पर सफलता मिली थी.
लेकिन कामयाबी का ग्राफ़ इस तेज़ी से चढ़ा कि महज़ चार साल बाद 2014 में भाजपा का पहला सांसद पार्टी का पटका पहने अपने वोटरों का अभिवादन स्वीकार कर रहा था.
कतंत्र के लिए इतिहास में एक काला दिवस के रूप में याद किया जाएगा"
बोरिस जॉनसन ने सांसदों से अपील की कि वो 31 अक्तूबर तक संसद में "एकता और संकल्प" दिखाएं, ताकि सरकार को ब्रेग्ज़िट के लिए यूरोपीय संघ के साथ एक नया डील करने का मौक़ा मिल सके.